अनुदानित अशासकीय महाविद्यालयों के 400 से अधिक पेंशनभोगियों की पेंशन बंद, प्राध्यापक संघ ने सरकार से आदेश वापस लेने की मांग की
ायपुर, छत्तीसगढ़ अनुदानित अशासकीय महाविद्यालयीन पेंशनभोगी प्राध्यापक संघ ने राज्य सरकार द्वारा अनुदानित अशासकीय महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त प्राध्यापकों एवं तृतीय-चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की पेंशन बंद किए जाने का विरोध किया है। संघ का दावा है कि सरकार के 1 सितंबर 2026 के आदेश से प्रदेश के 400 से अधिक पेंशनभोगी प्रभावित हुए हैं। संघ ने इसे पेंशनभोगियों के सामने गंभीर आर्थिक संकट पैदा करने वाला निर्णय बताया है।
संघ के अनुसार, 11 सितंबर 2026 को जारी एक अन्य आदेश के माध्यम से अनुदानित अशासकीय महाविद्यालयों में वर्तमान में कार्यरत प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन और ग्रेच्युटी की पात्रता एवं प्रावधान भी सेवा अवधि के दौरान समाप्त कर दिए गए हैं। संघ का कहना है कि इससे वर्तमान कर्मचारियों के भविष्य में सेवानिवृत्त होने के बाद आर्थिक सुरक्षा प्रभावित होगी।
संघ ने बताया कि अनुदानित अशासकीय महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों को पिछले कई वर्षों से पेंशन एवं ग्रेच्युटी का भुगतान किया जाता रहा है। संघ के मुताबिक, 26 अक्टूबर 2010 को तत्कालीन सरकार ने पांचवें वेतनमान में पेंशन तथा छठे वेतनमान में ग्रेच्युटी देने की व्यवस्था शुरू की थी। इसके बाद से सेवानिवृत्त प्राध्यापक एवं कर्मचारी निर्धारित प्रावधानों के अनुसार पेंशन प्राप्त करते रहे हैं।
हाईकोर्ट में भी पहुंचे मामले
संघ के अनुसार, शासकीय महाविद्यालयों के पेंशनभोगियों के समान वेतनमान के अनुरूप पेंशन और ग्रेच्युटी दिए जाने की मांग को लेकर 80 से अधिक सेवानिवृत्त प्राध्यापकों ने उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की थीं। संघ का दावा है कि विभिन्न मामलों में उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को संबंधित प्राध्यापक को जिस वेतनमान में सेवानिवृत्त हुआ है, उसी के अनुरूप पेंशन एवं ग्रेच्युटी का भुगतान करने के निर्देश दिए।
संघ ने यह भी कहा कि इन आदेशों के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर कई पुनर्विचार याचिकाएं भी उच्च न्यायालय ने खारिज की हैं। संघ के मुताबिक, आदेशों के अनुपालन को लेकर 50 से अधिक पेंशनभोगी प्राध्यापकों ने राज्य सरकार के खिलाफ न्यायालय की अवमानना के मामले भी दायर किए हैं, जिन पर कार्रवाई लंबित है।
संघ ने दावा किया कि कुछ मामलों में उच्च न्यायालय के आदेश के बाद छठे वेतनमान में ग्रेच्युटी और पेंशन का भुगतान शुरू किया गया था, लेकिन वर्तमान आदेश के बाद उसे भी रोक दिया गया है। संघ के अनुसार, जुलाई और अगस्त 2026 की पेंशन का भुगतान भी अब तक नहीं किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में भी मामला
संघ के अनुसार, पेंशन के वेतनमान से जुड़े उच्च न्यायालय के आदेशों के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की थी, जिन्हें खारिज कर दिया गया। संघ का दावा है कि इसके बाद भी 27 पेंशनभोगियों के मामलों में राज्य सरकार ने दोबारा सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की है।
संघ ने कहा कि 22 अगस्त 2026 की मंत्रिमंडल बैठक में पूर्व में लागू पेंशन एवं ग्रेच्युटी संबंधी व्यवस्था को निरस्त करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद 1 सितंबर और 11 सितंबर को आदेश जारी किए गए।
‘बुढ़ापे में पेंशन ही जीवन का सहारा’
संघ ने कहा कि प्रभावित पेंशनभोगियों में बड़ी संख्या उम्रदराज लोगों की है। उम्र से जुड़ी विभिन्न बीमारियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच पेंशन उनके लिए आर्थिक सुरक्षा का प्रमुख साधन है। संघ का आरोप है कि पेंशन बंद होने से सेवानिवृत्त प्राध्यापक और कर्मचारी गंभीर आर्थिक कठिनाइयों में आ गए हैं।
संघ ने कहा कि इन प्राध्यापकों ने उस दौर में प्रदेश की उच्च शिक्षा के विकास में योगदान दिया, जब राज्य में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के संस्थानों की संख्या सीमित थी। संघ के मुताबिक, उनके पढ़ाए विद्यार्थी प्रशासन, न्यायपालिका, विज्ञान, राजनीति और अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे हैं।
सरकार से तीन प्रमुख मांगें
पेंशनभोगी प्राध्यापक संघ ने राज्य सरकार से तीन प्रमुख मांगें की हैं—
- 1 सितंबर और 11 सितंबर 2026 को जारी पेंशन एवं ग्रेच्युटी बंद करने संबंधी आदेश तत्काल वापस लिए जाएं और पेंशन व्यवस्था बहाल की जाए।
- जुलाई और अगस्त 2026 की लंबित पेंशन का शीघ्र भुगतान किया जाए।
- उच्च न्यायालय द्वारा पेंशनभोगियों के पक्ष में दिए गए आदेशों का पालन करते हुए सेवानिवृत्ति के समय लागू वेतनमान के अनुरूप पेंशन एवं ग्रेच्युटी का भुगतान किया जाए। संघ ने चेतावनी दी है कि सरकार द्वारा मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिए जाने की स्थिति में पेंशनभोगी अपने अधिकारों के लिए आगे की कानूनी एवं लोकतांत्रिक कार्रवाई करने पर विचार करेंगे।